"अति आधुनिक आज़ादी के दीवानें "


"अति आधुनिक आज़ादी के  दीवानें "

आज १५ अगस्त है , भारतीय स्वतंत्रा  दिवस ! छुट्टी का दिन, मैं कोई सरकारी कर्मचारी नहीं ,भारतीय सेना में नहीं  और न ही स्कूल का विद्यार्थी !प्राइवेट कंपनी में कार्यरत एक छोटा सा कर्मचारी ! हर साल की तरह बिना किसी कार्यकर्म में जाने की सूचना मागें बगैर हमें कार्यस्थल से छुट्टी मिल गयी, वैसे दिन भी रविबार का है। 

कुछ दिन पहिले मैं फरीदाबाद में रहा करता था , तब हमारी कॉलोनी के द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में भाग लिया करता था। आज महामारी (Covid-19) के दौर में अतिआवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलना होता है और १४ अगस्त को ही वैक्सीन की दूसरी खुराक लेने के कारण मैं पूरा दिन घर पर ही था। 

अपनी दैनिक किर्याकर्म के साथ दिन की शुरुवात के साथ कुछ एक विडिओ देखीं ,समाचार चैनल देखा फिर व्हाट्सप पर कुछ मित्रो को "Happy Independence Day " का रिप्लाई किया और नास्ते  के बाद विश्राम करने लगा। 

लगभग ०१  बजे दोपहर  को पूर्ण विश्राम के बाद मैं जगा , चाय बनाया और चाय की कप के साथ मैंने सोचा खाली बैठे क्या करना ,भारतीय इतिहास के कुछ पन्ने ही उलट लिए जायें। १८५७ से १९४७ तक कुछ प्रमुख घटनाकर्म को देखता गया , सफ़ेद पन्नो पर काली स्याही के उन अक्षरों में आज भी कई मूक चीख ,कहीं गोरे रंग के अंदर की  बर्बरता तो कहीं देश-प्रेम में मर मिटे स्वतन्र्ता सैनानी के ताजे लहू की खुशबू थी। लोग कहते है आज ७५ साल हो गए पर ये क्या जालियांबाला बाग में खून के धब्बे ताजे  हैं। सुभाष अभी लौटे नहीं हैं, भगत के फांसी के पहिले के वो चार पन्ने बची तो है अभी ,किताब भी खुली है ,डायर के पहिले अभी भी जनरल लगा है ,और कई गोरों के नाम के लार्ड भी लगा हैं. इतिहास लिखने में कुछ गलती हो गयी होगी ,नहीं तो इतने बर्बर लोगों को लार्ड नहीं कहा जा सकता , आखें नम थी ,खून की गति सामान्य से थोड़ी तेज़!देशप्रेम रस से सरावोर। 

तभी किसी मित्र का व्हाट्सप आने के टोन से मैं देशप्रेम निंद्रा से जगा , मेरी चाय की कप मे आधी से कुछ ज्यादा बच रही चाय अब ठंढी पड़ चुकी थी। व्हाट्सप मे एक यूट्यूब  लिंक थी जिसका शीर्षक था ,"आज भी भारत आजाद नहीं !' ०८ मिनट २० सेकंड की ये विडिओ "लाइफ शो " नामक  एक चैनल द्वारा प्रसारित किया गया था ,जिसमें मुख्य रूप से देशद्रोही बातें राजनीती ,जातिवाद ,धर्मबाद  और आरक्षण जैसे मुद्दों का सहारा लिया गया था ,इसमें अंग्रेज को भारत के विकाश की नींब ,चीन और पाकिस्तान को मित्र बताते हुए मौजूदा सरकार को विदेशी बतायी गयी। 


इस विडिओ ने मुझे अंदर से जख्झोर दिया ,ये पता करना मुश्किल था की मैं दुःखी हुँ  ,कोर्धित हुँ  या फिर मैंने ये विडिओ देखकर महापाप कर दिया है। मजे की बात तो ये है की विडिओ के लास्ट मे उसने कहा , ऐसी विडिओ को देखने के लिए मेरी चैनल को सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन पर क्लीक करें, धन्यबाद !

 फिर यूँ ही मेरी अपनी ऊँगली मोबाइल स्क्रीन पर फिसलता रहा और करीब इसी मुद्दे पर २००-२५० विडिओ के शीर्षक पर मेरी नजर पड़ी। 


शाम के ३ बज चुके थे , मेरा  मन शांत न था , मुझे लग रहा था इन सभी "अति आधुनिक आज़ादी के दीवानों "पर एक लाइव मूवी बनाने की जरुरत है। वही जालियांबाला बाग़ का ग्राउंड ,२००-२५० लोगों की सभा जो अति आधुनिक आजादी के दीवाने हों। एक भारतीय सेना जो लार्ड कर्नल की रोल में हो और अंधाधुन गोलियाँ ! बस इस कहानी के पात्र और स्थान काल्पनिक के जगह बास्तविक होने चाहिए।

क्षमा करें कभी -कभी "अहिंसा परमो धर्मः "के पहिले "अ " हटाना जरुरी हो जाता है। 

पवन कुमार 

MBA(HR), LLB



Comments

  1. "वही जालियांबाला बाग़ का ग्राउंड ,२००-२५० लोगों की सभा जो अति आधुनिक आजादी के दीवाने हों। एक भारतीय सेना जो लार्ड कर्नल की रोल में हो और अंधाधुन गोलियाँ ! बस इस कहानी के पात्र और स्थान काल्पनिक के जगह बास्तविक होने चाहिए।"
    बिलकुल होना चाहिए मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ।

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  2. Good. keep yourself updated with Indian History

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