कब तक इंतजार करु!
कब तक इंतजार करू
शहर से बहुत दूर स्थित एक छोटा -सा गांव "किशनपुर" !जो अब भी मुख्य सड़क से लगभग 5-6 किलोमीटर दूर स्थित है। पूर्णतः प्रकीर्ति की गोद में बसी इस गांव में कुल मिलकर २०-३० मिट्टी के खपरैले घर होगें। चारों और हरी -हरी पेड़ ,पर्वते ,तलाव ,झरने तथा एक विशाल नदी था ,जिसमे प्रत्येक वर्ष भयंकर बाढ़ आया करता था।
सवेरा होते ही ,अंशुमाली की लालिमा तथा पक्षियों की चहचहाट हर इंशान को अपनी और आकर्षित कर ही लेता था। गांव के सामने एक बड़ा सा मैदान और किनारे में एक बरगद का पेड़ ,नीचे तलाव ,शाम में जब डूबते सूर्य की लालिमा युक्त प्रतिबिम्ब तालाब के जल में बनती तो प्रकिर्ति की सुंदरता में चार चाँद लग जाता।
उसी बरगद के नीचे दीपक अपने पैंट के दोनों पॉकेट में कनौले भर कर "कित -कित "खेला करता था। जब कभी भी वह हार जाता तो दीपा उसे खेल से बाहर कर देती। कहती "बच्चे ,सामने बैठकर देख कैसे खेला जाता है।
..... ए तू मुझे खेलने नहीं देगी तो मैं तुम्हें "कनौले " नहीं दूँगा।
अरे कनौले लाया है ,अच्छा ,दो न ! मैं तुम्हें अपने साथ खेलने दूंगी। दीपा घिघियाने लगती है ,लेकिन उसके बाद भी न मिलने पर वह छीनने का प्रयास करती है , फिर दोनों साथ मिलकर कनौले खाते हैं ,खेलने लग जाते हैं।
कभी-कभी जब दीपक देर से पहुँचता तो दीपा उसका बहुत इंतजार करती और कान पकड़ कर कहती ,अरे तुम इतना देर से आया , मैं कब से बैठी हूँ।
"मैं नहीं खेलूँगा तुम्हारे साथ ,तुम्हारा नाक बहता है। .दीपा अप्रसन्न होकर जाने लगती ,तो दीपक दौड़ कर उसे पकड़ लेता है... चलो न कनोले तोड़ेगें। कनोला का नाम सुनते ही दीपा का गुस्सा ठंडा हो गया। मुझे भी खिलायेगा न ?
हाँ , जरूर खिलाऊंगा चलो न ! फिर दोनों मिलकर कनोले तोड़ते हैं , बातें करते हुए खेलने में व्यस्त हो जाते हैं।
फिर अचानक दीपक बोलता है , जानती हो दीपा अब मैं खेलने नहीं आऊंगा।
क्यों, तब मैं किसके साथ खेलूँगी ?
अब मुझे पढ़ाई के लिए शहर जाना है। बाबू जी ने नामांकरण करा दी है। तुम भी तो अब पढ़ोगी न ?
नहीं मेरे बाबू जी नहीं है न ,माँ खेत में काम करती है , कौन मुझे पढ़ायेगा ,मैं तो शहर भी नहीं जा सकती।
दीपक उदास भरे स्वर में बोले ,"लेकिन मुझे तो जाना ही होगा नहीं तो बाबू जी पिटेगें।
....... फिर तुम शहर से कब आवोगे ?
पता नहीं। लेकिन जब भी आऊंगा ,तुम्हारे लिए ढेर सारा सामान लाऊगा ," नेमचूस , बिस्कुट और तुम्हारे लिए चूड़ी भी लाऊगां,...... लाओ न ये चुड़ी मुझे दे दो ,इतना बड़ा ही चुड़ी लाऊगां। बिलकुल लाल ,तुम्हे बहुत अच्छा लगेगा। और हाँ, मैं तुम्हारे लिए किताबे भी लाऊंगा और तुम्हें पढ़ाऊंगा भी।
ठीक है ,चलो अब घर चलते हैं। ..
दीपक उसे घर पंहुचा कर लौटने वाला ही था की घनघोर वर्षा ,बिजली की चमक जोरदार गर्जन से उसका दिल दहल गया। वह किसी तरह घर पंहुचा ,कपड़ा बदला , फिर चूल्हे के पास बैठकर हाथ सेका और खाना खाया , वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। देखते ही देखते एक भयानक बाढ़ से पूरा गावं जलमग्न हो गया ,सभी लोग अपने घरों के छपरों पर चढ़ने लगे थे। रूंदन ,विलाप,और चिल्लाहट से पूरा गावं गुंजित हो रहा था, सब ओर से "बचाओ, मर गया ".का आवाज ही सुनायी दे रही थी। प्रकृति अपना विकराल मुख को फैलाये ही जा रही थी।
सुबह हुयी ,बाढ़ शांत हुआ ,गावं के २ -४ मकान तो गिर ही गए थे ,जानवरों ,अनाजों की अपार छति के आलावा इस त्राशदी में अनेकों लोग मौत के मुँह में जा चुके थे।
दीपक दौड़ा-दौड़ा दीपा के घर गया। उसकी माँ और भाई फुट -फुट कर रो रहे थे ,और दीपा -दीपा चिल्ला रहे थे। दीपक को समझते देर न लगी ,फिर वो अपने डबडबाते हुए आखों को पोछते हुए पूछा ,"क्या हुआ दीपा को ?
डुब गयी ,डुब गयी ,लाश तक न मिला मेरी बेटी का ! उसकी माँ ने विलाप करती हुयी जबाब दी।
दीपक जोर -जोर से रोने लगा ,वह खूब रोया। २-३ दिनों तक खाना नहीं खाया। फिर वह पढ़ने शहर चला गया।
शहर में उसे प्रत्येक क्षण दीपा की याद आती ,उसकी आँखे हमेशा डबडबायी हुयी रहने लगी। बस याद स्वरूप उसके पास दीपा की दी हुयी चूड़ी ही बची थी। वह बार -बार उन चूड़ियों को देखता ,फिर खूब रोने लगता। समय बितता गया। किसी तरह वह हाई स्कूल की परीक्षा पास की।
शहर से आज १० वर्ष बाद गावं लौटना है। वही 'किशनपुर ' !वह जक्शन पर उतर कर गावं जाने के लिए टमटम पर बैठता है,गावं के नामी मजदुर 'मिठ्वा' अब टमटम चलने लगा था। गावं में पक्की सड़क बन गयी थी। स्कूल तथा एक छोटा अस्पताल भी बनने के बात चल रही थी। नदी में भी अब बांध बन गयी थी ,जिससे बाढ़ का खतरा अब नहीं रहा था।
गावं में अब सब कुछ था ,पर तब भी दीपक ज्यों -ज्यों गावं के नजदीक पहुँचता ,उसका मन उदास होता जाता। किसी तरह घर पंहुचा। घर में बाबू जी मरण शय्या पर लेते थे। माँ सामने चारपाई पर बैठी थी। दीपक बाबूजी और माँ को पैर छू कर प्रणाम किया। बाबूजी आँखे उठाकर बेटे को देखते हैं पर कुछ बोल न सके।
दीपक शाम को घूमने निकलता है तो सामने बरगद के पेड़ और तलाव देख उसकी आँखे डबडबा जाती है। वह वहीं बरगद के निचे बैठ और अतीत में खो जाता है। कब अँधेरा हो गया पता नहीं। जब अतीत से हकीकत में लौटा तो चारों और अँधेरा देखकर भोचक्का रह गया।
एक लम्बी साँस लेकर घर की और चल दिया। इसप्रकार वह अपना समय व्यतीत करता रहा। कुछ ही दिनों में उसके पिता जी स्वर्ग सिधार गए। अति दुःख से पीड़ित उसकी माँ भी थोड़े ही दिनों में चल बसी। अब वह बिलकुल निराश और अकेला बचा था। उसका न तो कोई परिजन था न ही दोस्त। अब वह अकेला टिल्हे के उसी खपरैलें माकन में प्रकीर्ति के भयानक मार से चखनाचुर जीवन को कोसता और उसे शब्दों में बांधता रहता था। अब अगल -बगल में कोई घर भी नहीं बचे थे। सभी गावं के मुख्य सड़क के किनारे पक्के मकान बना लिए थे। वहां से ठीक नीचे अस्पताल की छत दिखाई पड़ती थी ,जहाँ हर सुबह रोगियों की गिरगिराहट ही सुनायी पड़ती।
दीपक लिखता रहता ,बस लिखता ही रहता। उसने कई उपन्यास ,कहानियाँ ,एकांकी लिखी जिसमे दीपा के रूप यौवन का वर्णन ,उसके बाएं गाल पर तिल ,दाहिनें हाथ की उंगुली पर कटे का निशान ,मनपसंद कनोले का भी वर्णन उसने भरपूर रूप से की थी। जिसमें ८-१० उपन्यास प्रकाशित भी हुयी।
भाग -२
एक बार सेठ हीरालाल अपने धर्मपत्नी ,पुत्र राजेश के साथ तीर्थ करने कुंभ मेला में पहुंचे। वहाँ पुत्री ने बांसुरी लेने की जिद कर दी ,हीरालाल बासुरी खरीदने लगा तभी उसकी पुत्री वहां से कहाँ चली ,उसे कुछ पता नहीं चला।
हीरालाल और उसकी पत्नी ने उसे बहुत ढूंढा पर पूजा का कोई पता नहीं चला। खोये हुए ८-१० दिन हो चुके थे ,हीरालाल और उसका परिवार बहुत दुखी था। पुलिस में कंप्लेंट भी लिखवाई गयी ,भगवान से मन्नतें भी की जा रही थी।
तभी उसने नदी किनारे घूमते हुए एक बच्चे की रोने की आवाज सुनी , वे उसके पास गया और नाम ,पता पूछने लगे। वह अपना नाम "दीपा " और कुछ नहीं बता पा रही थी,सिर्फ रोती ही जा रही थी। उन्होंने उसे गोद में उठाया और घर ले आये। घर में उसकी पत्नी भी खोयी हुयी पुत्री के गम को भूलकर उसको ही अपनी पुत्री मानने लगी।
दीपा अब पढ़ने भी जाने लगी। समय बितता गया और दीपा उच्य शिक्षा प्राप्त करने दिल्ली चली गयी। वहाँ गर्ल्स हॉस्टल में उसके साथ प्रेरणा भी रहती थी। प्रेरणा मेडिकल की तैयारी कर रही थी तथा दीपा इतिहास में स्नातक कर रही थी। प्रेरणा पढ़ने में बहुत तेज़ थी। उसकी अपेक्षा दीपा पढ़ने के अलावा घूमना , फिल्में देखना ,कहानियाँ-उपन्यास आदि पढ़ने में ज्यादा रुचि रखती थी।
दिवाली का समय आ चूका था ,सभी छात्र -छात्राएं कॉलेज में छुट्टी का इंतजार करने लगे थे। दीपा भी छुट्टियाँ मानाने का बहुत सोच रखी थी , ख़रीदारियाँ चल रही थी , दीपा हर बार की भांति इस बार भी एक -दो नए उपन्यास खरीद कर ले आयी।
उसमे से एक उपन्यास का नाम था "कब तक इंतजार करू ". रात को खाना खाने के बाद जब वो ये उपन्यास पढ़ने बैठी तो पढ़ती ही रह गयी ,इसके पहले कोई भी उपन्यास इसे इतना आकर्षित नहीं किया था , प्रेरणा के कई बार मन करने के बाद भी वह पूरी रात जगती रही। दीपा को हर मोढ़ पर बहुत मजा आ रहा था ,कहानी में वर्णित जीवन का उतार -चढ़ाव से उसे ऐसा लगने लगा की इस कहानी का उसके साथ कोई संबंध है ,इतना ही नहीं उसकी इठलाती यौवन ,गाल पर तिल ,हाथों पर कटे का निशान ,मनपसंद कनोले की बात उसकेफ इरादे को और पक्का कर रहा था। उसे ऐसा लगता की उसका पिछले जनम से इसका कोई सम्बन्ध है।
उसने प्रेरणा को सारी बात बताई। प्रेरणा उसकी बातो को टालते हुवे कहने लगी मैं इन बातो पर यकीन नहीं करती हूँ ,ऐसा तुम्हें लगता है पर ऐसा कुछ नहीं है। पर दीपा का दिल नहीं माना और वो लेखक के दिए गए पते पर एक पत्र लिखी !
प्रिय लेखक ,
आपको नमस्कार !
आपकी उपन्यास मुझे बहुत अच्छी लगी !मैं आपके उपन्यास को बार -बार पढ़ी ! फिर भी मन नहीं भरता ,ऐसा लगता है जब आपके उपन्यास इतनी सूंदर है तो आप कैसे होगें , कृपा करके आपका कोई अन्य प्रकाशन हो तो हमें जरूर भेजें। और हाँ आप अपना एक तस्वीर मुझे जरूर भेजिएगा।
आपका प्रशंशिका,
दीपा
शाम ढल चुकी थी ,दीपक लिखने में व्यष्त था। तभी बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई दी। दीपक उठकर बाहर की ओर देखा तो सामने एक डाकिया।
शायद कोई पत्र लाया होगा ,पर मुझे कौन पत्र दे सकता है?
तभी डाकिया ने कहा "दीपक कुमार "आपका नाम है?
जी हाँ !
आपका पत्र है।
दीपक पत्र को हाथ में लेकर खोला और पढ़ने लगा। ज्यों ही उसकी नजर दीपा पर पड़ी तो उसके अँधेरा छा गया ,वो सारा दृस्य सामने आ गया।
वह अपने आप से पूछने लगा ,क्या ये वही दीपा तो नहीं। उसने सोचा ...नहीं ....मेरी दीपा तो ...... उसकी आखे भर आयी। मेरी समझ मे नहीं आ रही। ...... ये कोई दूसरी दीपा होगी , लेकिन ये मेरी तश्वीर क्यों माँगा है ?
नहीं मैं अपना फोटो नहीं दुगा। ऐसे मे मैं अपने दीपा दीपा को धोखा नहीं दे सकता। नहीं मैं ऐसा कदापि नहीं करूँगा।
दीपक ने अपना एक -दो प्रकाशन और किसी बूढ़े के फोटो के साथ एक पत्र लिखा।
प्रिय प्रसंशिका ,
धन्यवाद !
मैं बहुत खुश हूँ , मुझ जैसे विर्ध लिखी उपन्यास की इतनी प्रसंशा की। मैं एक -दो उपन्यास साथ हूँ।
दीपक कुमार !
उस दिन प्रेरणा और दीपा में एक लम्बी बहस चल रही थी। दीपा कहती उसका पत्र जरूर आएगा , प्रेरणा कहती ऐसा कुछ भी नहीं है।
कुछ देर बाद डाकिया को आते देख दीपा ख़ुशी से उछल पड़ी ,उसने जल्दी -जल्दी लिफाफा खोला ,जब उसकी नजर उस बूढ़े तस्वीर पर पड़ी तो उसकी स्थति नजर पांव पड़े हो गयी ,उसे ऐसा लगा जैसे कोई आसमान में ले जाकर निचे धकेल दिया हो।
उधर प्रेरणा बहुत खुश थी। वह दिन कॉलेज में सभी लड़के -लड़कियों के बीच जाकर कहने लगी।
दोस्तों !
शायद आपलोग नहीं जानते होगें की हमारी सहेली अपने सपनों राजकुमार चुन ली है। वो राजकुमार है ये..... प्रेरणा ने जब उस बूढ़े का तस्वीर को दिखाया तो सभी हॅसने लगे और दीपा वहाँ से गुस्से में चली गयी।
कुछ दिन बाद मेडिकल में प्रेरणा का सलेक्शन हो गया ,और उसका जोइंनिंग एक नए हॉस्पिटल में हुआ। वो गरीबों के दुःख -दर्द समझती और उसका सही उपचार करती।
प्रेरणा का छोटा भाई अरुण ,जिसे परिवार में कोई अन्य सदस्य न होने कारण अपने साथ ही रखती थी। उसे पढ़ाने का लाख कोशिश करती पर वो पढ़ने के बजाय अपने दोस्तों के साथ घूमने व जुआ आदि में अधिक समय व्यतीत करता।
एक बार अरुण देर रात तक घर नहीं आया। उस रात प्रेरणा को भी नींद नहीं आ रही थी। रात के करीब १ बज चुके थे। आस -पास सनन्ता छा चूका था। प्रेरणा दरबाजे से बाहर झांकी बहार तेज़ हवा चल रही थी। वह कुछ देर तक इधर -उधर देखती रही ,अचानक उसकी नजर पास एक झोपड़ी पर पड़ी। जहाँ रात इतनी देर भी दीविया टिमटिमा रहा था,उस टिमटिमाते रोशनी के मंद प्रकाश में किसी के बैठे होने की छाया भी दिखाई दी।
प्रेरणा सोचने लगी ,आखिर कौन हो सकता है ? इतनी रात तक क्या करता होगा। यह दृस्य लगभग हर दिन देखने लगी। उसके मन में अभिलाषा जगी की वह उसे वहाँ जाकर देखे, और एक रात वह दबे पाँव उस झोपड़ी के निकट पहुंची,उसने झोपड़ी के बारीक़ छिद्रो से अंदर झाँका।
एक दुबला -पतला आदमी चटाई पर बैठकर कुछ लिखता जा रहा है। उसके चेहरे पर गजब की तत्परता है,लगता है अब वो लक्ष्य को जल्दी ही छूने वाला है।
प्रेरणा सोचती है कि वह जाकर पूछे कि वह क्या लिखता है ,पर इतनी रत रात को अचानक उससे बाते करने में उसे संकोच हो रहा था। तभी उस झपड़ी से खासने की आवाज आने लगी।
उस रत जब प्रेणा घर पहुंची तो अपने घर में सारे लोगों को देखकर दंग रह गयी। जब वह अंदर पहुंची तो उसका भाई अरुण दो -चार दोस्तों के साथ मिलकर शराब पी रहा था। अरुण तुम ये क्या कर रहे हो ,मैं तुम्हारे बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकती थी। प्रेरणा गुस्से और अस्चर्य भरे शब्दों में कहा।
हा -हा। ..हा -हा !तो यही है मेरी बहन प्रेरणा ,कैसी है मिस्टर राज आनंद ? तुम्हारे है न !
अरुण तुम पागल हो गए हो ,प्रेरणा गुस्से से गयी।
पागल नहीं ,मैं ठीक कह रहा हूँ ,राज आनंद इस इलाके का नमी ठीकेदार है ,तुम इसके साथ बहुत खुस रहोगी और मैं भी इसकी बहन पूजा के साथ बहुत खुश रहुगा।
अच्छा ,तो तुम हमारा सोडा करना चाहते हो ,नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूगी।
मैं सोच भी नहीं सकती की मेरा भाई मेरे साथ ऐसा सकता है।
प्रेरणा कमरे में जाकर रोने लगी।उसके आखों के सामने वो सारा दृस्य उभरने लगा की वह किस किस तरह माँ और पिताजी के गुजर जाने के बाद अपने सौतेले भाई को पाली थी ,वह जिस दिए को अंधकार में प्रकाश की समझ कर संजोती आ रही थी वो एक दिन उसका घर ही जला देगा ,ऐसा सोची नहीं थी।अब उसके सामने अंधकार ही दिखाई दे रही थी।
सुबह उठकर उसने जब अरुण के कमरे में गयी ,तो शराब की कई बोतले बिखरी पड़ी थी और अरुण पलंग की जगह निचे ही मृतक की भांति पड़ा था।
आज किसी तरह तरह अस्पताल में दिन गुजरने के बाद जब शाम ढली तो वह उसी झोपड़ी की तरफ जाने लगी जहाँ वो व्यक्ति टिमटिमाती प्रकाश में कुछ लिख रहा था।
वो अब पहुंचने ही वाली थी की किसी की आहट पाकर पीछे मुड़ी। अरे यह तो वही जो अरुण के साथ कल शराब पी रहा था। वह तेज़ क़दमों से झोपड़ी की तरफ बढ़ने लगी। पर वह व्यक्ति समीप आ चूका था। उसके मुख से शराब की बदबू आ रही थी , जब तक वह उससे कुछ कहता ,प्रेरणा चिल्ला उठी, दीपक ने झोपड़ी के झरोखे से देखा ,कोई वेबस लड़की उसकी ओर चली आ रही है।
दीपक को समझते देर न लगी ,और उसने प्रेरणा को अपने पीछे करके ुष गुंडे को कहने लगा :-
भाई छोड़ दो इसें।
साले हट ,मेरी छोकरी को मुझसे दूर करता है।
मैं हाथ जोड़ता हूँ आपके पांव पड़ता हूँ , कृपया आप यहाँ पर कुछ न करें।
सेल तू ऐसे नहीं मानेगा ,उसने एक तमाचा दीपक के गाल पर जड़ दिया। दीपक एक ओर जा गिरा और उश्के मुख से खून निकलने लगा।
साली मुझसे दूर भागती है ,अपने महबूब से!
छोड़ दो -छोड़ दो मुझे ! वह चीखने लगी।
दीपक को न जाने कहाँ से शक्ति आ गयी , वह लकड़ी का एक बल्ला उठाकर जोरदार प्रहार आंनद के सिर पर किया और वह वहीँ ढेर गया.
फिर उसने प्रेरणा पूछा आपका नाम क्या है आप कहाँ रहती हैं?
प्रेरणा बोली ," मैं एक डॉक्टर हूँ और यहीं पास के फ्लैट मैं रहती हूँ , ये राज आनद है जिसको आपने बेहोस कर दिया है, यह यहाँ का नामी ठीकेदार है ., मैं आपको पूरी कहानी बताती हूँ ! लेकिन आप इतनी रात इस झोपड़ी मैं क्या करते हो , मैं आपको रोज देखती हूँ आप कुछ न कुछ देर रात तक लिखते रहते हैं। क्या करते हैं आप?
दीपक बोले , अब बहुत रात हो गयी है , आप जाएये हम फिर कभी बात करते हैं
प्रेरणा:- अब आपका यहाँ रहना ठीक नहीं है , आप यहाँ से भाग जोवो , नहीं तो ये लोग आपको मार देंगे। आप चाहो तो आप पास के हॉस्पिटल या मेरे घर चल कर रेस्ट कर लो।
तभी राज आनंद को होस अा गया , वो फ़ोन कर अपने कुछ साधियो को बुला लिया
दीपक और प्रेरणा वह से भाग निकले , प्रेरणा ने अपनी दोस्त दीपा को कॉल किया और दोनों उसके घर चली गयी
दीपक , प्रेरणा और दीपा ने अपना अपना आपबीती शेयर की , अंततः दीपा ने दीपक से विवाह कर ली !
लेखक :-
पवन कुमार

Thanks ji
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